Home लाइफ स्टाइल धर्म अध्यात्म द्रोणागिरी गांव, जहां कभी नहीं की जाती है हनुमानजी की पूजा, जानिए...

द्रोणागिरी गांव, जहां कभी नहीं की जाती है हनुमानजी की पूजा, जानिए क्यों?

36
हनुमानजी

हम सब जानते है हनुमान जी प्रमुख आराध्य देवों में से एक है, और जहां-जहां भारतीय रहते हैं, वहां-वहां उनकी पूजा की जाती है। लेकिन बहुत काम लोग जानते है कि हमारे ही देश में एक जगह ऐसी है जहां हनुमान जी की पूजा नहीं की जाती है, यहां तक कि वहां हनुमानजी का कोई मंदिर तक नहीं है। ऐसा इसलिए क्योंकि यहां के रहवासी हनुमान जी से आज तक नाराज़ हैं। यह जगह है उत्तराखंड स्थित द्रोणागिरि गांव।

द्रोणागिरि गांव

द्रोणागिरि गांव उत्तराखंड के सीमांत जनपद चमोली के जोशीमठ प्रखण्ड में जोशीमठ नीति मार्ग पर है। यह गांव लगभग 14000 फुट की ऊंचाई पर स्थित है। यहां के लोगों का मानना है कि हनुमानजी जिस पर्वत को संजीवनी बूटी के लिए उठाकर ले गए थे, वह यहीं स्थित था।

चूंकि द्रोणागिरि के लोग उस पर्वत की पूजा करते थे, इसलिए वे हनुमानजी द्वारा पर्वत उठाकर ले जाने से नाराज हो गए। यही कारण है कि आज भी यहां हनुमानजी की पूजा नहीं होती। यहां तक कि इस गांव में लाल रंग का झंडा लगाने पर पाबंदी है।

द्रोणागिरि गांव के निवासियों का मत

द्रोणागिरि गांव के निवासियों के अनुसार जब हनुमान बूटी लेने के लिए इस गांव में पहुंचे तो वे भ्रम में पड़ गए। उन्हें कुछ सूझ नहीं रहा था कि किस पर्वत पर संजीवनी बूटी हो सकती है। तब गांव में उन्हें एक वृद्ध महिला दिखाई दी। उन्होंने पूछा कि संजीवनी बूटी किस पर्वत पर होगी? वृद्ध ने द्रोणागिरि पर्वत की तरफ इशारा किया।

हनुमान उड़कर पर्वत पर गए लेकिन वहां बूटी कहां होगी यह पता न कर सके। वे फिर गांव में उतरे और वृद्धा से बूटीवाली जगह पूछने लगे। जब वृद्धा ने बूटीवाला पर्वत दिखाया तो हनुमान ने उस पर्वत के काफी बड़े हिस्से को तोड़ा और पर्वत को लेकर उड़ गए। बताते हैं कि जिस वृद्धा ने हनुमान की मदद की थी उसका सामाजिक बहिष्कार कर दिया गया। आज भी इस गांव के आराध्य देव पर्वत की विशेष पूजा पर लोग महिलाओं के हाथ का दिया नहीं खाते हैं और न ही महिलाएं इस पूजा में मुखर होकर भाग लेती हैं।

निषेध की कथा

यूं तो राम के जीवन पर बहुत सारी रामायण लिखी गई है पर इनमे से दो प्रमुख है एक तो वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण और एक तुलसीदास द्वारा रचित रामचरित मानस। इनमे से जहां वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण को सबसे प्रामाणिक ग्रन्थ माना जाता है वही तुलसीदास द्वारा रचित रामचरित मानस सबसे अधिक पढ़ा जाता है।