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निजी स्कूलों की शुरू हुई मनमानी, फीस के नाम पर हो रही लूट, गर्मियों की छुट्टी का भी पैसा ले रहे स्कूल संचालक, लुटे जा रहे अभिभावक

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लुटे जा रहे अभिभावक

रवि भूतड़ा/बालोद- बच्चों की पढाना बच्चों का खेल कतई नही हैं, बहुत कम ऐसे माता-पिता होंगे, जिन्हें अपने बच्चे की स्कुल फीस को लेकर चिंता न होती हो, दूसरी तरफ निजी स्कुल हैं की बढती क्लास के साथ फीस में 10 से 20 फीसदी की बढ़ोत्तरी कर देते हैं, इतना ही नही साल भर किसी न किसी नाम पर स्कुल माता-पिता की जेब काटते ही रहते हैं, आखिर क्यों स्कुल अब शिक्षा केन्द्रों की जगह किसी दूकान का सा रूप लेते जा रहे हैं.

सत्र प्रारम्भ होते ही निजी स्कुल संचालक व स्टेशनरी संचालक सक्रिय हो जाते हैं, और वही हो रहा हैं, स्कुल संचालक बकायदे स्टेशनरी खोल कर स्कुल में ही अभिभावकों से लुटाई प्रारम्भ कर दी हैं, लेकिन यहाँ का शिक्षा विभाग बिका हुआ हैं, सब कुछ देखने जानने के बाद भी कार्यवाही के नाम पर शिक्षा अधिकारी अपनी कुर्सी से उठते तक नही, यहाँ मनमानी पर उतारू निजी स्कुल और किताब विक्रेता डंके की चोट पर फ़ीस, कापी-किताब, यूनिफार्म के नाम पर अभिभावकों को महीने भर से लुट रहे हैं, लेकिन स्कुल और दुकानदारों के खिलाफ प्रशासन कार्यवाही करना तो दूर की बात जाँच पड़ताल करने तक की हिम्मत नही जुटा पा रहा हैं,

छात्रों के हित के लिए संगठन चला रहे छात्र नेता अब स्वय की जेब भरने जैसा काम कर रहे हैं, हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी सत्र प्रारम्भ होने वाला हैं, स्कुल संचालकों द्वारा छात्र-छात्राओं के अभिभावकों से लुट शुरू कर दी गई हैं, और छात्र संगठन न जाने क्यों चुप्पी साधे बैठे हैं, ऐसे में यह कहना अतिश्योक्ति नही होगी की यहाँ के छात्र संगठन खुद की जेब भरने में जुट गए हैं, स्टेशनरी संचालकों से लेकर स्कुल संचालक छात्र-छात्राओं के अभिभावकों से लुट रहे हैं, लेकिन यहाँ तो प्रशासनिक अधिकारीयों को कुछ नही दिखता.

छात्र हित की बात करने वाले नेता देखावे के आन्दोलन करते हैं

छात्र हितों की बात करने वाले संगठन तो स्वतंत्र हैं वे तो आवाज़ बुलंद कर कार्यवाही करवा सकते हैं, लेकिन वे भी छुट-पुट आंदोलनों व फोटों छपवाने तक सीमित रहते हैं, यहाँ तो स्कुल संचालक बकायदे स्कुल में ही स्टेशनरी खोल कर किताब कापी व अन्य स्टेशनरी सामग्री बेच रहे हैं, जिले में संचालित कई ऐसे स्कुल हैं जिन पर पिछले वर्ष नाममात्र की कार्यवाही हुई थी, या यु कहे सिर्फ खानापूर्ति, अब फिर से वही हो रहा हैं, बावजूद इसके न शिक्षा अधिकारी इस ओर देख रहे और न ही छात्र नेता,

जिले के छात्र संगठन राजधानी से लेकर जिले तक महज दिखावे के आन्दोलन करते हैं, वाहनों में बकायदे लिखाए घूमते हैं, मैं फला छात्र नेता अध्यक्ष, मैं फला, लेकिन छात्रों के हित की बात तो दूर अभिभावक लुट रहे हैं, लेकिन छात्र संगठनों में सन्नाटा खिंचा हैं, फीस के नाम पर तो किताब-कापी के नाम पर तो यूनिफार्म के नाम पर छात्रों के अभिभावकों से खुलेआम लुट हो रही हैं, लेकिन यहाँ प्रशासनिक अधिकारी तो दूर छात्र संगठन भी चुप्पी साधे बैठे तमाशा देख रहे हैं, यहाँ अभिभावकों की पीड़ा समझने वाला कोई नही हैं, यहाँ सब स्कुल संचालक और अधिकारीयों की मिलीभगत से हो रहा हैं, लेकिन नकेल कसने वाला कोई नही,

गरीब हो या आमिर सबके साथ होती हैं पढाई के नाम पर लूट

जरा सोचे की किस तरह अभिभावक अपने बच्चों लप पढ़ाने के लिए कोई ठेला चला कर तो कोई बनी मजदूरी कर तो कोई सब्जी बेच कर पैसे जुटाता हैं और पूरा पैसा बच्चों की पढाई में जा रहा हैं, गरीब हो या फिर अमीर के बच्चे निजी स्कुल के संचालक किसी को नही बख्सते हैं, यहाँ यह कहना गलत नही होगा की आजकल शिक्षा का मंदिर व्यापार बन चूका हैं, यहाँ हर चीज़ के दाम चुकाने पड़ते हैं,

कार्यवाही के नाम पर दिखावे वाली जाँच का खेल करता हैं प्रशासन-
यहाँ जाँच पड़ताल होती भी हैं तो गोपनीय तरीके से फिर बाद में मामला सलटा दिया जाता हैं, कमीशन के चक्कर में निजी स्कुल और चुनिन्दा किताब दुकानदारों ने आपसी साठगाठ कर सिलेबस में निजी प्रकाशकों की महँगी किताबे शामिल कर ली, यूनिफार्म बदल दी, लेकिन निजी स्कूलों के रसूख और किताब दुकानदारों की पहुच के आगे प्रशासन इस बार भी बौना साबित हो रहा हैं,