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कमल विहार प्रोजेक्ट से सुप्रीम कोर्ट ने हटाई रोक

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कमल विहार प्रोजेक्ट

रायपुर। राजधानी में प्रदेश की सबसे बड़ी कालोनी कमल विहार को नियम विरुद्ध और पर्यावरण के खिलाफ बताते हुए लगाई गई याचिका सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी । विधि विशेषज्ञों के अनुसार इस याचिका के खारिज होने के साथ ही इस प्रोजेक्ट पर लगा स्टे भी स्वतः खत्म हो गया। याचिका खारिज होते ही रायपुर विकास प्राधिकरण (आरडीए) ने कमल विहार में निर्माण, जमीनों की रजिस्ट्री तथा किसी भी तरह की एनओसी पर लगा प्रतिबंध हटा लिया है।

कमल विहार में सारे काम बुधवार से उसी तरह चलेंगे, जैसे स्टे के पहले चल रहे थे। कमल विहार में जमीन अधिग्रहण को लेकर आरडीए और राजेंद्र प्रसाद शुक्ल और चार अन्य लोगों के बीच विवाद है। यह मामला कोर्ट में है।

इसके अलावा इस पूरे प्रोजेक्ट को ही नियम विरुद्ध बताते हुए संबंधित लोगों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगा दी थी। कोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया था। इसके बाद आरडीए ने कोर्ट में अपना जवाब पेश किया। इस मामले में कोर्ट ने पर्यावरण मंत्रालय से भी जवाब लिया। पर्यावरण मंत्रालय भारत सरकार ने कोर्ट को जानकारी दी कि बिल्डिंग, निर्माण प्रोजेक्ट, टाउनशिप तथा एरिया डेवलपमेंट प्रोजेक्ट जो एनवायरोनमेंट इंपैक्ट एसेसमेंट (ईआईए) नोटिफिकेशन-2006 में लिस्टेड हैं।

इसमें समय-समय पर कई संशोधन हुए हैं। कमल विहार प्रोजेक्ट ईआईए में बी-कैटेगरी में शामिल है। ऐसे प्रोजेक्ट को पर्यावरण मंत्रालय के लिए राज्यस्तरीय समिति से अनुमति की जरूरत होती है। 2011 में यह अनुमति आरडीए ने राज्य शासन और समिति से ली है। आरडीए के वकील ने सुप्रीम कोर्ट में जवाब देते हुए कहा कि याचिकाकर्ता ने इस आधार पर प्रोजेक्ट पर रोक लगाने की मांग की है, जो गलत है।

पूरे प्रोजेक्ट को कोर्ट में घसीटने पर फटकार

आरडीए के चीफ इंजीनियर जेएस भाटिया ने बताया कि याचिका खारिज करते हुए कोर्ट ने याचिकाकर्ता से कहा कि व्यक्तिगत विवाद पर पूरे प्रोजेक्ट के औचित्य पर सवाल नहीं उठाया जा सकता। 1600 एकड़ में विकसित कमल विहार प्रोजेक्ट राज्य की पहली बड़ी टाउनशिप स्कीम है। यहां सैकड़ों लोगों ने जमीन ली है, लोग मकान भी बना रहे हैं। पीएम आवास के मकान भी बन रहे हैं।

ये है जमीन विवाद

आरडीए ने कमल विहार योजना के लिए लोगों से जमीन अधिगृहीत की और बदले में संबंधित लोगों को जमीन का 35 प्रतिशत डेवलप प्लाट ऑफर किया। यहां खसरा नंबर 308 को लेकर विवाद है। इस खसरे के 24 बटांकन में कुल 8.106 हेक्टेयर (20.02 एकड़) जमीन है। याचिकाकर्ताओं के नाम खसरा नंबर 308 का बटा एक, छह, सात और 12 में 2.849 हेक्टेयर (7.04 एकड़) जमीन है। आरडीए ने इनकी जमीन अधिगृहीत की तो तीनों कोर्ट चले गए। कोर्ट के आदेश पर आरडीए ने इन्हें जमीन लौटा दी। बाद में तीनों ने कंटेप्ट लगाया कि उन्हें कम जमीन लौटाई गई है। आरडीए ने लैंड रिकार्ड के हवाले से जवाब दिया कि कागजों पर ही जमीन ली थी, और कोर्ट के आदेश के बाद उतनी ही जमीन लौटा दी। जमीन न तो हमारे नाम है और न ही उस पर कब्जा है। यह मामला तहसील और संबंधित याचिकाकर्ताओं का है।