Home पर्यटन सदियों से चल रहा कांटागांव का ऐतिहासिक मावली मेला शुरू

सदियों से चल रहा कांटागांव का ऐतिहासिक मावली मेला शुरू

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कांटागांव

कोंडागांव। जिले में स्थित कांटागांव मावली मेला का सामपुर परगना में विशेष स्थान होता है। सदियों से शामपुर परगन में कांटागांव मेंला आयोजित होता है। कांटागांव मेला के पश्चात हि शामपुर परगन के गांव में मेला आयोजित होता है। मेला में देवताओं की शोभायात्रा रोचक व देखने लायक होती है, जो स्थानीय निवासियों की पारंपरिक आस्था और विश्वास को दर्शाता है।

शामपुर परगन की प्रमुख दो दिवसीय कांटागांव मावली मेला का 13 अप्रैल को भव्य शुभारंभ हुआ, जिसमें परगन के समस्त 84 गांव की देवी देवताएं मेला में हिस्सा लिए ।मेले में स्थानीय के साथ-साथ दूरदराज से व्यापारियों ने दुकानें लगा हैं। क्षेत्रवासियों को विशिष्ट पारंपरिक मेले का वर्ष भर इंतजार रहता है।

पारंपरिक वाद्ययंत्रों से होती है शुरुआत

मेले में सर्वप्रथम मावली माता मंदिर प्रांगण में गायता पुजारी व समस्त ग्रामीण एकत्रित होकर ढोल नगाड़े मोहरी बाजा आदि पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुन के साथ मंदिर प्रांगण में शामपुर परगन के 84 गांव से आने वाली देवी देवताओं को सम्मान आमंत्रित करते हैं। जहां सामने सामने रावत नर्तक दल आकर्षण का केंद्र होता है ।उसके पश्चात प्रांगण से सभी देवी देवता मिलकर एक साथ मेला परिभ्रमण को निकलते हैं। मेला परिभ्रमण में मेला में आए हुए सभी देवी देवताओं के लाट,बैरक, अंगा, डोली, आदि सभी शामिल होकर मेला स्थल के फेरा लगाते हैं ।

इस दौरान आस्था ,विश्वास का अलग-अलग रूप दिखाई देता है। सिरहा, गुनिया अपने आपको तरह-तरह की यातनाएं देते हुए नजर आते है।जिससे अपने आपको देवी देवताओं के करीब मानते हैं। कोई मूह में सूल घोपता है, लोहे की जंजीर से अपने आप को मारकर देवताओं के करीब मानते है। देवीयां लोहे की कील से बनी कुर्सी में बैठकर मेला का फेरा लगाती है।

फेरा के पश्चात सभी देवी देवताएं एक स्थान पर एकत्रित होकर अपनी अपनी कलाबाजी का प्रदर्शन करती है जिसे देवनाच कहते हैं।अंत में आने वाले सभी देवी देवताओं को कुछ पैसे व फूल भेंट स्वरूप प्रदान किया जाता है।

मेले में आधुनिकता का तड़का

मेला में आधुनिकता का तड़का भी लगने लगा है। मेला स्थल में लगे हुए तरह तरह झूले छोटे बच्चों और बड़ों के लिए आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। मेला में देवी देवताओं के उपयोग होने वाला पारंपरिक सामानों कलस, बेंत, कौड़ी से बुने हुये कपड़े, बेंत आदी का विक्रय करने दूरदराज से लोग पहुंचते हैं। घोटिया से देवी देवताओं के कलस, घोड़े, मूर्तियां बेचने आई महिला ने बताया प्रतिवर्ष मेला में दुकान लगाती हूं।