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फिल्म समीक्षाः चार दीवारों के भीतर सियासत अपने असली रंग में कैसी होती है, ये देखने के लिए ‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ जरूर देखें

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फिल्म समीक्षाः चार दीवारों के भीतर सियासत अपने असली रंग में कैसी होती है, ये देखने के लिए 'द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर' जरूर देखें

नई दिल्ली। सबसे पहले सबसे पहले वाली बात। अगर इस वीकएंड आप इस बात को लेकर भ्रम में हैं कि इस हफ्ते रिलीज हुई फिल्मों उरी- द सर्जिकल स्ट्राइक और द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर में से कौन सी देखनी चाहिए और कौन सी मिस करनी चाहिए तो जवाब सीधा और सपाट है। उरी उन दर्शकों के लिए जिनके दिल में देशभक्ति है और द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर उनके लिए है जो देश के लिए दिमाग से सोचते हैं।

द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर की कहानी शुरू होती है आम चुनाव के नतीजों से और सोनिया गांधी की उस कथित त्याग से जिसमें उन्होंने एक अर्थशास्त्री को देश का प्रधानमंत्री बना दिया। देश को आर्थिक तरक्की के मुहाने तक ले आने वाला एक शख्स कैसे सियासत की गुफा में जाकर फंस जाता है, यही इस फिल्म का सार है। फिल्म ये भी बताती है कि कांग्रेस में जो कुछ है वह बस एक परिवार है और इस परिवार के चारों तरफ ही पार्टी के दूसरे ग्रह चक्कर काटते रहते हैं।

मनमोहन सिंह को ये फिल्म एक हैरान, परेशान और किन्हीं किन्हीं दृश्यों में मानसिक रूप से बलवान व्यक्ति के रूप में पेश करती है। लेकिन, फिल्म का असली एंगल हैं संजय बारू। एक पत्रकार को कैसे लगने लगता है कि वह किसी बड़े नेता का करीबी होने के बाद उसका भाग्यविधाता है, यह देखना फिल्म में असली दिलचस्पी जगाता है।

फिल्म द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर को इसके कलाकारों की अदाकारी के लिए भी देखना बनता है। और, इस विभाग में सौ में से सौ नंबर जिस कलाकार ने हासिल किए हैं, वह है अक्षय खन्ना। हिंदी फिल्मो में फोर्थ वॉल से बात करने (दर्शकों से संवाद) का संभवत: यह पहला प्रयोग है। अक्षय खन्ना ने संजय बारू के दिमाग में चलती रहने वाली योजनाओं को बहुत ही कौशल से अभिनय के जरिए उतारा है।

अनुपम खेर के किरदार के बारे में इतना कुछ लिखा-कहा जा चुका है कि उनकी अदाकारी पूरी फिल्म में तलवार की धार पर चलने जैसी हो जाती है। थोड़ा टाइम लगता है दर्शकों को इस किरदार में अनुपम खेर को स्वीकार करने में लेकिन आखिर तक आते आते अनुपम खेर भी छाप छोड़ने में सफल रहते हैं।

इन दोनों के अलावा सोनिया गांधी बनी सुजैन बर्रर्ट की अदाकारी भी लाजववाब है। आहना कुमरा और अर्जुन माथुर को प्रियंका और राहुल के रूप में फिलर के तौर पर इस्तेमाल किया गया है। दोनों की अदाकारी इन किरदारों की कसौटी पर पूरी तरह खरी नहीं उतरती।

बतौर निर्देशक विजय गुट्टे ने अपनी पहली ही फिल्म में इतनी बड़ी चुनौती स्वीकार की जो मंजे हुए निर्देशक भी अपने करियर में कम ही उठाने को तैयार रहते हैं। हिंदी सिनेमा में बायोपिक अब फैशन है लेकिन जीवित किरदारों की बायोपिक बनाकर सफल हुए निर्देशक गिनती के ही हैं। विजय ने ये ध्यान रखा कि फिल्म को किताब की कहानी के दायरे से बाहर न जाने दिया जाए।

फिल्म में इस्तेमाल किए गए असली फुटेज जब फिल्म की कमजोरी बनने लगते हैं तो वह अक्षय खन्ना की आवाज को इसे संभालने के लिए इस्तेमाल करते हैं। फिल्म की पटकथा जरूर कहीं कहीं कमजोर लगती है। सिवाय इस बात के कि गांधी परिवार मनमोहन सिंह पर हावी रहा, फिल्म मनमोहन सिंह के कार्यकाल में हुए कोयला घोटाले या स्पेक्ट्रम घोटाले की बात नहीं करती।

फिल्म में गाना कोई है नहीं लेकिन बैकग्राउंड म्यूजिक पर थोड़ी मेहनत और की जा सकती थी। हां, फिल्म का संपादन चुस्त और दुरुस्त है। चार दीवारों के भीतर सियासत अपने असली रंग में कैसी होती है, इसे समझने के लिए फिल्म एक बार देखी जा सकती है।